Thursday, November 5, 2009

माँ को इज्जत देनें मे अगर शर्म आती है तो कहीं डुब मरो

जी हाँ बिल्कुल सही सुना आपने। अगर ऐसा वाकया आपको देखने को मिले जहाँ कोई अपनी माँ को माँ कहने में शर्म महसुस करता हो और पुछने पर कहता हो ये बताने के लिए कि ये माँ है,माँ कहना जरुरी नहीं है। जरा सोचिए कितनी शर्मसार करने वाली घटना है। मेरा ये कहना उनके लिए है जो की अपने आपको भारतीय कहते है और "वन्दे मातरम्" जैसे पवित्र शब्द जो की हमारा राष्ट्रिय गीत है, को गाने से इनकार करते है और कहते है कि ये इस्लाम विरोधी है। जिसकी खाते है, जहाँ रहते है, उसको समर्पित दो शब्द कहने की बारी आती है तो उसे धर्म विरोधी बताकर उसका गान करने से मना करना कितनी शर्म की बात है एक कहावत है "जिस थाली में खाना उसी में छेद करना" यहा फिट बैठती है। धरती माँ जिससे हमें जीवन मिलता है, जिससे पेट भरने के लिए दो वक्त की रोटी मिलती है, जिसकी लाज बचाने के लिए न पता कितनो नें अपने प्राण की आहूती दे दी उसको सम्मान देनें में जिसे शर्म आती है उसे सच कह रहा हूँ कहीं डुब मरना चाहिए। जमीयत उलेमा हिंद ने देश के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को गैर-इस्लामिक करार देते हुए इसके खिलाफ फतवा सुना दिया है। जमीयत के राष्ट्रीय अधिवेशन के दूसरे दिन पारित एक प्रस्ताव में कहा गया है कि मुसलमान को वंदे मातरम् नहीं गाना चाहिए। क्यो भाई क्यों, न पता इस गीत को लेकर इतना विवाद क्यों है। मुझे लगता है पूरी दुनियाँ में ये पहली घटना होगी जहाँ राष्ट्रगान को लेकर विवाद हो रहा है।
हमारे यहाँ या कहिए विश्व भर में हर देश के अन्दर बहुत से जन जाती और धर्म के लोग रहते है। उनका हर क्रिया कलाप एक दुसरे धर्म के पुरक होता है। यहीं इन सबको एक राष्ट्र और एक देश मे बाँधने का काम करता है राष्ट्र गीत या राष्ट्र गान। लेकिन बड़े दुख की बात है हमारे देश में कुछ गलत अवधारणा के लोगो नें राष्ट्र गीत को विवादित कर दिया है। मान लेता हूँ कि राष्ट्रियता जताने के लिए राष्ट्रगान करना आवश्यक नहीं है, लेकिन भला ऐसा हो सकता है क्या ? आप भारत में रहकर पाकिस्तान जिन्दाबाद कहें और फीर कहें कि मैंने भारत मुर्दाबाद नहीं कहा तो कोई विश्वास करेगा क्या ?।

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय सरकारी सेवा में थे और १८७० में जब अंग्रेजी हूकमत ने 'God save the King/Queen' गाना अनिवार्य कर दिया तो इसके विरोध में वन्दे मातरम् गीत के पहले दो पद्य १८७६ में संस्कृत में लिखे। इन दोनो पद्य में केवल मातृ-भूमि की वन्दना है। उन्होंने ने १८८२ में आनन्द मठ नाम का उपन्यास बांग्ला में लिखा और इस गीत को उसमें सम्मिलित किया। उस समय इस उपन्यास की जरूरत समझते हुये इसके बाद के पद्य बंगला भाषा में जोड़े गये। इन बाद के पद्य में दुर्गा की स्तुति है। कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (१८९६) में, रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे लय और संगीत के साथ गाया। श्री अरविन्द ने इस गीत का अंग्रेजी में और आरिफ मौहम्मद खान ने इसका उर्दू में अनुवाद किया है। आरिफ मोहम्मद खान भी एक मुसलमान थे और सच्चे मुसलमान थे। जब उन्होने इसका उर्दू अनुवाद किया तो क्या बिना पढे किया था, ऐसा तो नहीं होगा। उन्होने इसका मर्म समझा था तब अनुवाद किया, अब आज के मुसलमान कह सकते है कि शायद वे सच्चे मुसलमान नहीं होगें।

इस देश में असंख्य अल्पसंख्यक वन्दे मातरम्‌ के प्रति श्रद्धा रखते हैं। मुफ्ती अब्दुल कुदूस रूमी ने फतवा जारी करते हुए कहा था कि राष्ट्रगान का गायन उन्हें मुस्लिमों को नरक पहुँचाएगा। बहिष्त लोगों में लोहा मण्डी और शहीद नगर मस्जिदों के मुतवल्ली भी थे। इनमें से 13 ने माफी मांग ली। आश्चर्य की बात है कि अपराधिक गतिविधियों में शामिल होना, आतंकवादी कार्रवाईयों में भाग लेना, झूठ, धोखा, हिंसा, हत्या, असहिष्णुता, शराब, जुआ, राष्ट्र द्रोह और तस्करी जैसे कृत्य से कोई नरक में नहीं जाता मगर देश भक्ति का ज़ज़बा पैदा करने वाले राष्ट्र गान को गाने मात्र से एक इंसान नरक का अधिकारी हो जाता है। ब्रिटेन के राष्ट गान में रानी को हर तरह से बचाने की प्रार्थना भगवान से की गई है अब ब्रिटेन के नागरिकों को यह सवाल उठाना चाहिए कि कि भगवान रानी को ही क्यो बचाए, किसी कैंसर के मरीज को क्यों नहीं? बांग्लादेश से पूछा जा सकता है कि उसके राष्ट्रगीत में यह आम जैसे फल का विशेषोल्लेख क्यों है? सउदी अरब का राष्ट्रगीत ‘‘सारे मुस्लिमों के उत्कर्ष की ही क्यों बात करता है और राष्ट्रगीत में राजा की चाटुकारिता की क्या जरूरत है? सीरिया के राष्ट्रगीत में सिर्फ ‘अरबवाद की चर्चा क्या इसे रेसिस्ट नह बनाती? ईरान के राष्ट्रगीत में यह इमाम का संदेश क्या कर रहा है? लीबिया का राष्ट्रगीत अल्लाहो अकबर की पुकारें लगाता है तो क्या वो धार्मिक हुआ या राष्ट्रीय? अल्जीरिया का राष्ट्रगीत क्यों गन पाउडर की आवाज को ‘हमारी लय और मशीनगन की ध्वनि को ‘हमारी रागिनी कहता है? अमेरिका के राष्ट्रगीत में भी ‘हवा में फूटते हुए बम क्यों हैं? चीन के राष्ट्रगीत में खतरे की यह भय ग्रन्थि क्या है? किसी भी देश के राष्ट्रगीत पर ऐसी कोई भी कैसे भी टिप्पणी की जा सकती है लेकिन ये गीत सदियों से इन देशों के करोडों लोगों के प्रेररणा स्रोत हैं और बने रहेंगे। उनका उपहास हमारी असभ्यता है। शम्सु इस्लाम हमें यह भी जताने की कोशिश करते हैं कि वन्दे मातरम्‌ गीत कोई बड़ा सिद्ध नहीं था और यह भी कोई राष्ट्रगीत न होकर मात्र बंगाल गीत था। वह यह नहीं बताते कि कनाडा का राष्ट्रगीत 1880 में पहली बार बजने के सौ साल बाद राष्ट्रगीत बना। 1906 तक उसका कहीं उल्लेख भी नहीं हुआ था। आस्ट्रेलिया का राष्ट्रगीत 1878 में सिडनी में पहली बार बजा और 19 अप्रैल 1984 को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त हुआ।

वन्दे मातरम्‌ गीत आनन्दमठ में 1882 में आया लेकिन उसको एक एकीकृत करने वाले गीत के रूप में देखने से सबसे पहले इंकार 1923 में काकीनाड कांग्रेस अधिवेशन में तत्कालीन कांग्रेसाध्यक्ष मौलाना अहमद अली ने किया जब उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के हिमालय पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर को वन्दे मातरम्‌ गाने के बीच में टोका। लेकिन पं. पलुस्कर ने बीच में रुकर कर इस महान गीत का अपमान नहीं होने दिया, पं- पलुस्कर पूरा गाना गाकर ही रुके। सवाल यह है कि इतने वषो तक क्यों वन्दे मातरम्‌ गैर इस्लामी नह था? क्यों खिलाफत आंदोलन के अधिवेशनों की शुरुआत वन्दे मातरम्‌ से होती थी और ये अहमद अली, शौकत अली, जफर अली जैसे वरिष्ठ मुस्लिम नेता इसके सम्मान में उठकर खड़े होते थे। बेरिस्टर जिन्ना पहले तो इसके सम्मान में खडे न होने वालों को फटकार लगाते थे। रफीक जकारिया ने हाल में लिखे अपने निबन्ध में इस बात की ओर इशारा किया है। उनके अनुसार मुस्लिमों द्वारा वन्दे मातरम्‌ के गायन पर विवाद निरर्थक है। यह गीत स्वतंत्रता संग्राम के दौरान काँग्रेस के सभी मुस्लिम नेताओं द्वारा गाया जाता था। जो मुस्लिम इसे गाना नहीं चाहते, न गाए लेकिन गीत के सम्मान में उठकर तो खड़े हो जाए क्योंकि इसका एक संघर्ष का इतिहास रहा है और यह संविधान में राष्ट्रगान घोषित किया गया है।

बंगाल के विभाजन के समय हिन्दू और मुसलमान दोनों ही इसके पूरा गाते थे, न कि प्रथम दो छंदों को। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अधिवेशन में इसका पूर्ण- असंक्षिप्त वर्शन गया गया था। इसके प्रथम स्टेज परफॉर्मर और कम्पोजर स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर थे।
13 मार्च 2003 को कर्नाटक के प्राथमिक एवं सेकेण्डरी शिक्षा के तत्कालीन राज्य मंत्री बी-के-चंद्रशेखर ने ‘प्रकृति‘ शब्द के साथ ‘देवी लगाने को ‘‘हिन्दू एवं साम्दायिक मानकर एक सदस्य के भाषण पर आपत्ति की थी। तब उस आहत सदस्य ने पूछा था कि क्या ‘भारत माता, ‘कन्नड़ भुवनेश्वरी और ‘कन्नड़ अम्बे जैसे शब्द भी साम्दायिक और हिन्दू हैं? 1905 में गाँधीजी ने लिखा- आज लाखों लोग एक बात के लिए एकत्र होकर वन्दे मातरम्‌ गाते हैं। मेरे विचार से इसने हमारे राष्ट्रीय गीत का दर्जा हासिल कर लिया है। मुझे यह पवित्र, भक्तिपरक और भावनात्मक गीत लगता है। कई अन्य राष्ट्रगीतों के विपरीत यह किसी अन्य राष्ट्र-राज्य की नकारात्मकताओं के बारे में शोर-शराबा नह करता। 1936 में गाँधीजी ने लिखा - ‘‘ कवि ने हमारी मातृभूमि के लिए जो अनके सार्थक विशेषण प्रयुक्त किए हैं, वे एकदम अनुकूल हैं, इनका कोई सानी नहीं है। 26 अक्टूबर 1937 को पं- जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कलकत्ता में कांग्रेस की कार्यसमिति ने इस विषय पर एक प्रस्ताव स्वीकृत किया। इसके अनुसार ‘‘ यह गीत और इसके शब्द विशेषत: बंगाल में और सामान्यत: सारे देश में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीयय तिरोध के प्रतीक बन गए। ‘वन्दे मातरम्‌ ये शब्द शक्ति का ऐसा पस्त्रोत बन गए जिसने हमारी जनता को प्रेरित किया और ऐसे अभिवादन हो गए जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की हमें हमेशा याद दिलाता रहेगा। गीत के प्रथम दो छंद सुकोमल भाषा में मातृभूमि और उसके उपहारों की प्रचुरता के बारे में देश में बताते हैं। उनमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर धार्मिक या किसी अन्य दृष्टि से आपत्ति उठाई जाए।

ऐसा भी नहीं है कि सभी मुसलमानो ने इसका विरोध किया हो, ये आप देख ही चुके है। आजादी की लड़ाई के समय हिन्दू और मुसलमान साथ-साथ कदम से कदम मिलाकर चले थे और उत्साह वर्धन के लिए सभी भारत माता के सैनिक 'वन्दे मातरम' कहकर आगे बढ़ रहे थे , तब किसी ने इसका विरोध नहीं किया। आज कट्टरावादी इसपर सांप्रदायिकता की चादर डालने में लगे है जो की हमारे हिन्द के लिए तनिक भी ठीक नहीं होगा। चिन्ता की बात तो ये यह है कि ये लोग ये बात समझने को तैयार नहीं है और भेड़ के समान एकदूसरे के पिछे चलते जा रहे है। मेरा तो कहना साफ है जो अपने देश का राष्ट्र गान करने में शर्म महसुस करता हो उसे कहीं डुब मरना चाहिए जहाँ सूखा पड़ा हो, और ऐसे गद्दारो को देश मे भी स्थान नहीं देना चाहिए।

36 टिप्पणियाँ:

  1. Bahut hi achcha lekh.......... kai saari baaton se knowledge bhi mili........


    VANDE-MAATRAM.......
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  2. chullu bhar pani mein . wo bhi road side.......
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  3. mithilesh,

    bahut accha likhe ho baabu...
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  4. बिल्कुल सही बात
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  5. 'वंदे मातरम्' के बारे में अच्‍छी जानकारी एकत्रित की है .. बहुत बढिया लेख !!
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  6. सही कहा है आपने | पर हमारी केंद्रीय सरकार का गृह मंत्री ऐसे कार्यक्रमों मैं सामिल होता है जहां वन्दे मातरम् के खिलाफ फतवा जारी होता है | जब अपनी सरकार ही इस फतवे को पिछले दरवाजे से समर्थन देती है तो ... हम आप तो बस इसका विरोध ही कर सकते हैं |

    अपराधिक गतिविधियों में शामिल होना, आतंकवादी कार्रवाईयों में भाग लेना, झूठ, धोखा, हिंसा, हत्या, असहिष्णुता, शराब, जुआ, राष्ट्र द्रोह और तस्करी जैसे कृत्य से कोई नरक में नहीं जाता मगर देश भक्ति का ज़ज़बा पैदा करने वाले राष्ट्र गान को गाने मात्र से एक इंसान नरक का अधिकारी हो जाता है ? --> बिलकुल सटीक कहा है |
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  7. सॉलिड पोस्ट...हिन्दी में ठोस कहते हैं ऐसी पोस्टों को. :)
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  8. वन्दे मातरम! यह कैसा धर्म है जो राष्ट्र धर्म के आड़े आए?
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  9. वैसे ही हमारी नदियाँ पहले से इंसानों द्वारा फैलाई गई गंदगी से पटी पडी है, अगर ये डूब मरे तो और भी ......नहीं, नहीं ऐसा मत कहो, हे भगवान्! हमारी गंगा माता की रक्षा करना !
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  10. वन्दे मातरम् का के इतिहास की प्रमाणिक जानकारी ...
    गर्व से कहें ..वन्दे मातरम ..!!
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  11. ऐसे लोगो से इज़्ज़त चाहिये भी नही।सटीक लिखा आपने।आपका कोई जवाब नही तारीफ़ मे सिर्फ़ इतना ही कहूंगा,

    दुबे जी ज़िंदाबाद्।

    वंदे मातरम्।
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  12. बहुत ही सार्थक एवं ज्ञानवर्धक बातों से प्रस्‍तुत यह लेख बहुत ही अच्‍छा लगा, सब अगर इसी तरह का जज्‍बा रखें तो क्‍या बात है, आभार के साथ्‍ा 'वन्‍दे मातरम्'
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  13. उड़न तश्तरी से सहमत… इसी को कहते हैं ठोस ब्लॉगिंग… तथ्यपरक और तर्कपूर्ण लेख… बहुत बढ़िया… वन्देमातरम…
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  14. Desh Ka Gaddar Hai Woo Jo Bande Matram Nahi Gata Hai
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  15. इस विचारोत्तेजक आलेख को पढ़कर मेरे रोंगटे खड़े हो गये। मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हूं और समर्थन भी।
    हार्दिक शुभकामनाएँ।
    ------------------
    परा मनोविज्ञान- यानि की अलौकिक बातों का विज्ञान।
    ओबामा जी, 75 अरब डालर नहीं, सिर्फ 70 डॉलर में लादेन से निपटिए।
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  16. जी हाँ माँ !!!

    अगर आप वन्दे मातरम की वक़ालत करते हैं और साथ ही पूर्व जन्म में भी अकीदा रखते है तो यह पूर्ण रूप से परस्पर विरोधी विचारधारा होगी और यह संभव नहीं कि दोनों एक साथ लागू हो सकेंगे. कैसे ? आईये मैं बताता हूँ कि कैसे राष्ट्रवाद एक बुनियाद-रहित विचारधारा है, यदि आप पूर्वजन्म में विश्वाश रखते है तो यह संभव है कि आपका जन्म दोबारा मनुष्य के रूप में हो सकता है और हो सकता है कि आप भारत के अलावा दुसरे मुल्क में पैदा हो सकते हैं. मिसाल के तौर पे आप अगर आपके पिता जी या दादा जी दोबारा जन्म लेते हैं और अबकी बार वह अफगानिस्तान या पकिस्तान या चाइना आदि में कहीं जन्म लेते हैं तो क्या वह भारत के खिलाफ़ लडेंगे तो नहीं? क्या वह भारत से नफ़रत तो नहीं करेंगे?? ऐसा तो नहीं कि वे इस जन्म में तालिबान से मिलकर अपने प्यारे हिन्दोस्तान के खिलाफ़ आतंकी घटनाओं में तो लिप्त नहीं रहेंगे???

    इस्लाम का बुनियादी उसूल है "तौहीद" अर्थात एकेश्वरवाद। तौहीद से दुनिया का कोई भी मुसलमान समझौता नहीं कर सकता। इस्लाम एकेश्वाद का समर्थक है और उस की शिक्षा अनुसार कोई भी मुसलमान उस एक ईश्वर (अल्लाह) के सिवाय किसी को भी पूज्य नहीं माना जाता है, न ही देश न ही कोई दूसरा खुदा!!
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  17. bahut hi sathak lekh likha hai.......aaj koi bhi hindu ya muslim vande matram ka virodhi nhi hai sirf rajniti ki bisat par apni gotiyan senkne wale aisi ochhi baat karte hain aur dharmik bhavnayein ujagar karke katuta failate hain........aaj agar koi muslim ye kahta hai ki wohindustani hai to use rashtriy geet se viorodh kyun hoga ......kya wo hindustani nhi hai?agar hai to virodh kyun?aaj har hindu muslim ko is ghere ko todna hoga aur eknayi pahl karni hogi kisi ke bhi na kahne mein aane ki tab jakar halat samajh aa payenge.........nahi to bhavnaon se khelne wale khelte hi rahenge aur aam insaan yun hi piste rahenge.
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  18. आपको पता नहीं, मुसलमान अपने बैंक में जमा धन पर जो ब्याज मिलता है उसे लौटा देते हैं. दारू नहीं पीते, जूआ नहीं खेलते. वैभवशाली जीवन नहीं जीते. काहे की यह सब हराम है. कोई फतवा इन पर सुना है? बस वन्दे मातरम गाना पाप है.....भाड में जाए ऐसे लोग, हमारी बला से.
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  19. जिनके ऊपर भारत का संबिधान पूरी तरह लागू नहीं
    होता , वो लोग ऐसी ओछी हरकत करेंगे ही | जब तक एक देश- एक संबिधानऔर एक कानून लागू नहीं होगा तब तक ऐसा होता रहेगा
    उनको मालूम है की वोट की राजनीति के चलते कोई
    कार्रवाई नहीं होगी |
    इतना समय बीत गया सरकार की तरफ से कोई बयान नहीं आया , शर्म भी नहीं आती
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  20. जानकारी भरपूर लेख के लिए बहुत बहुत धन्यवाद! एक बात बताऊं यार, अगर विवाद करने वाले को समझना होता या शांति चाहिए होती तो वो ऐसे घटिया फतवे जारी न करे। लेकिन उसको तो विवाद खड़ा करना है।
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  21. वाह दुवे जी,

    आपने दुश्मनों को चारों खानों चित कर दिया । जो अपने माँ को माँ नही कह सकता है वह बेटा किसका कहलाएगा ।

    वंदे मातरम्' के बारे में अच्‍छी जानकारी एकत्रित किये है । बहुत ही अच्‍छा लगा ।
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  22. बहुत ही सार्थक लेख मित्र,
    भारत को एक रखना है तो वन्‍दे मातरम् कहना है।
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  23. the best article (blog) i read in last 10 days...

    बहुत खुब.. इसके विरोध वालों को सोचना चाहिये कि जब इसे संविधान में "राष्ट्रिय गीत" का दर्जा प्राप्त है तो इसकी अवमानना संविधान की अवमानना है.. आप अपने देश के संविधान में विश्वस नहीं रखते.. आप पर कोई दबाब नहीं है कि आप गाओ.. आप न गाना चाहते है तो आपकि इच्छा है.. पर खुले आम इसकि अवज्ञा नहीं कर सकते..

    संविधान के खिलाव फतवा.. लोगों को अपने सोच के दायरे तो विस्तृत करना चाहिये..
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  24. वंदे मातरम्.....
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  25. बहुत ही सुंदर, सठिक और सार्थक लेख लिखा है आपने! बहुत बढ़िया लगा और अच्छी जानकारी भी प्राप्त हुई ! हम सब को अपने देश पर गर्व होना चाहिए और एकता बनाये रखना चाहिए और सभी भारतवासी को वंदे मातरम याद रखना चाहिए!
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  26. बहुत सटीक अभिव्यक्ति.... बढ़िया आलेख.
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  27. माँ को इज्जत देनें मे अगर शर्म आती है तो कहीं डुब मरो .....

    अपने आपको भारतीय कहते है और "वन्दे मातरम्" जैसे पवित्र शब्द जो कि हमारा राष्ट्रिय गीत है, को गाने से इनकार करते है और कहते है कि ये इस्लाम विरोधी है। जिसकी खाते है, जहाँ रहते है, उसको समर्पित दो शब्द कहने की बारी आती है तो उसे धर्म विरोधी बताकर उसका गान करने से मना करना कितनी शर्म की बात है ....

    बहुत ही सार्थक और सही बात कही आपने ...आपकी पोस्ट गर्व करने लायक है .....!!
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  28. "जननी जन्म भुमिस्च स्वर्गादपि गरीयसी" माँ तुल्य मातृभूमि को नमन करना जो गुनाह समझते है उन्हें उनका खुदा भी नहीं बक्श्ता ये सब insecurity और दिमागी संकीर्णता के मरीज है उनको एक बूंद पानी भी नसीब ना हों.आपके आलेख ने सोई हुई चेतना को जगा दिया, बहुत ही प्रभावशाली लेख; टीवी पर सुना तो इतनी प्रभावित नहीं हुई. काश देश का हर नागरिक मातृभूमि के प्रति आप जैसी ही भावना रखे तो सचमुच ही यह धरती स्वर्ग सामान होंगी
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  29. @Mithilesh dubey
    तुम साबित क्या करना चाहते हो? यही कि जिसने वन्दे मातरम गा लिया वह देशभक्त हो गया और जिसने गाने से मना कर दिया वह देशद्राही?

    गौर कर मेरी बात पर
    तुम्हारे लिए सिर्फ वन्देमातरम गाना ही देशभक्ति है तो हम मुस्लिमों के लिए मरने के बाद अपने ही वतन की मिट्टी में मिलना वतन की माटी से सच्चे प्रेम की निशानी है। हम मुस्लिम उसी वतन की जमीन की मिट्टी में मिलते है जिस वतन की मिट्टी में पैदा होते हैं। ना हम दफन होने मक्का जाते और ना मदीना।

    और तुम लोग?
    शव को जलाने के बाद उसकी राख तक ले जाते हो और बहा देते हो उस गंगा में जो देश की सीमाओं को पारकर दूर किसी देश में उस राख को ले जाती है। क्या यही है तुम्हारा अपनी जननी के प्रति प्रेम? वतन की माटी में मिलने में तुम्हें शर्म महसूस होती है?
    तुम्हारी नजर में वन्दे मातरम सिर्फ बोल देना ही देशभक्ति है तो मेरी नजर में अपने देश की माटी में मिलना सच्ची देशभक्ति है।
    सोचो कौनसी देशभक्ति ज्यादा अहमियत रखती है?
    जिस तरह तुम हमसे कहते हो कि हम वन्दे मातरम बोलकर देशभक्त बनें, मैं तुम्हें कहता हूं कि सिर्फ एक गीत गाने से ही देशभक्त होते तो दुनियाभर की खूबियों के मालिक ये गायकार होते जो सैंकडों गाने अच्छे-अच्छे अर्थ वाले गा चुके हैं।
    सही मायनों में देशभक्त बनो और अपने वतन की माटी से सच्ची मोहब्बत की मिसाल पेश करो जैसी हम लोग करते हैं। अपना तन उसी देश की माटी को समर्पित करो जहां का खा पीकर बड़े हुए हो। अपनी माटी से दगा ना करो।
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  30. आप लोगों को मेरे पैगाम पर शक है!
    आओ मुझे चेक करो और सच्चे दिल से मेरे बारे में अपनी राय बनाओ
    कल क़यामत के दिन तुम्हे जवाब देना होगा की तुमने मेरे बारे में किस नियत से फेसला लिया था
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  31. इन लोगों के पूर्वजों को उस वक़्त 'God save the King/Queen' गाना गाने में कोई शर्म नहीं आयी होगी .............. हां आज वोट बैंक की तरह इस्तेमाल होने वालों को वन्दे मातरम् में जरूर धर्म नज़र आता है ............. काश इन सब बातों से उठ कर देश को सुद्रद्द बनाने में कोई काम करें ऐसे लोग ........
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  32. ये बहुत हि दुःखद बात है कि इस मुद्दे पर इतनि चर्चा हो रही है। में बाबा निर्भय हाथरसि कि एक कविता कि पंक्तियॉ इस सन्दर्भ मे लिखना चाहूँगा ।
    "गन्गा तट पर चाहे अरबी आबे जमजम पीना चाहे,
    काशी को माने यदि काबा तो भी कुछ इन्कार नहिं है॥
    लेकिन:
    वन्दे मातरम गाना होगा या इस घर से जाना होगा,
    वरना जिसके तीर्थ जहां है उसका वहिं ठिकाना होगा,
    घर परिवार कुटुम्ब कबीला सब कुछ वहिं बसाना होगा,
    वन्दे मातरम गाना होगा या इस घर से जाना होगा…………………………………॥
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  33. Bahut hi achhi jankari aur deshbhakti se bhara hai.
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  34. Nice views.I appreciate your take on the whole issue Mithlesh.

    Sometimes back I had written an artice on it.The article was appreciated quite well amid the readers.Have a look at it.

    http://indowaves.instablogs.com/entry/should-muslims-not-recite-vande-mataram/
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आपकी राय हमारे लिये महत्तवपूर्ण है । अपनी बात को बेबाकी से कहें ।